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Thursday, March 26, 2020

कोरोना

वाह रे कुदरत क्या नजारा दिखाया हैं,
इन्सानों को अब तूने सच में इन्सान बनाया है,
आजाद हुए आज परीन्दे ,
कैद में इन्सान आया है,
वाह रे कुदरत क्या नजारा दिखाया हैं।
शौख पूरे किये इन्सानों ने ,
मार मार के जानवरो को खाया है,
आज जानवरो ने इन्हे मौत का रुख दिखाया है,
आज इन्सान खुद ही खुद के पिन्जरे में आया है,
वाह रे कुदरत क्या नजारा दिखाया हैं ।
बहुत रूलाया इन्सानों ने बेजुवानों को,
अब इनके रोने का दिन आया है,
कोरोना का रूप लेकर ,
इन्हीं का करमा इनके सामने आया है,
वाह रे कुदरत क्या नजारा दिखाया है।।


(चाँदनी पाठक)

Monday, March 25, 2019

"मीनार"

पिछले कुछ दिनों से जब सुबह नींद खुलती है
तो काफी उलझन रहती है दिल में,
फिर जब थोड़ा आंख मलकर देखता हूँ,
तो सामने दिखती है एक बड़ी सी अंजान इमारत।

वो मेरे सामने इस तरह बाहें फैलाए खड़ी रहती है,
मानो कोई प्राचीन खूबसूरत सी मीनार हो।

बस ये जानने के लिए कि उतनी ऊंचाई से कैसा लगता है,
मैं उस मीनार पर चढ़ जाता हूँ।
उस ऊँची मीनार की चोटी पर अनगिनत बादल तैरते दिखाई देते हैं।
न जाने कितने ही रंग बिरंगे पक्षी उड़ते दिखाई देते हैं।
खिले दिखते हैं असंख्य मनमोहक फूल और उन पर मंडराती सैकड़ों रंगीन तितलियाँ और भँवरे।

उस ऊंचाई पर मुझे अलग ही एहसास होता है।
मेरी सारी उलझनें दूर हो जाती हैं और एक अलग ही सुकूं मिलता है।
हल्की हल्की सी बहती हवा जब भी मुझे छू के गुज़रती है,
लगता है मानों मेरे सारे ग़मों को साथ उड़ाकर कहीं दूर फेंक आती है।

मैं उस मीनार की छत पर बैठ दूर खुद को हवा में उड़ते देखता हूँ,
लगता है जैसे अब कोई भी तकलीफ मुझे छू न पाएगी।

मग़र फ़िर याद आती है जब अपने परिवार और माँ की,
तो उनकी खुशी के लिए मैं नीचे उतर आता हूँ।
लेकिन जब नीचे उतरता हूँ उस मीनार से मैं,
तो फिर से वही उलझनें, वही उदासी मुझे घेर लेती है।

कभी-कभी सोचता हूँ कि क्यों न उस मीनार पर ही रह जाऊं,
जहाँ न कोई उलझन है और न ही कोई तकलीफ।

पर कभी भी ऐसा कर नहीं पाता,
क्योंकि जैसे ही मैं उस मीनार पर चढ़ता हूँ,
कुछ ही देर में कोई न कोई मुझे नीचे खींच लेता है।

मैं उनसे पूछा करता हूँ कि आख़िर क्यों मैं उस मीनार पर रह नहीं सकता?
और हर बार मुझे एक ही जवाब मिलता है
कि इस मीनार से नीचे और दूर रहने की वजह ढूँढो,
हर बार इस पर चढ़ने की नहीं।

मैं उनसे पूछता हूँ - क्यों?
जबकि मुझे तो उस मीनार पर बहुत ही सुकून मिलता है।

वो मुझे बताते हैं कि इस मीनार ने कई लोगों की जानें ली है,
इस मीनार को लोग 'दर्द' कहते हैं।

फिर मैं ये सोचता हूँ कि जब इस दर्द की मीनार ने कई लोगों की जान ली है,
तो मुझे इस पर हमेशा सुकून क्यों मिलता है? क्यों यहां आकर मेरी हर उलझन दूर हो जाती है?

इन्हीं सवालों का जवाब मैंने कई जगह ढूँढा

और आखिर में मुझे जवाब एक किताब की इक पंक्ति में मिला। वो पंक्ति है-

"दर्द का हद से गुजरना ही है दवा हो जाना"

तो क्या सचमुच मेरा दर्द हद से गुजर गया है?
क्या अब मेरा खुशी से कोई वास्ता नहीं?


-ओमकार भास्कर 'दास'

Sunday, February 3, 2019

कितने प्यारे फूल खिले है....

कितने प्यारे फूल खिले है,
अंजाम अपना भूल, खिले हैं।

हैरान मेरी कामयाबी पर,
रकीबों के भी होठ सिले है।

अब न बिछड़ेगे हम कभी,
उलझनों से ये दिल मिले है।

नजरों में है हया- ए -मोहब्बत,
शायद यहाँ रुह से रुह मिले है।

अपनों ने दिया धोखा जब-जब,
कुछ पराये हमराही साथ चले है।

नहीं शौक कि कोई शायर कहे, 
हम तो मियाँ बस दिलजले है।

अल्लाह की इनायत है मुझ पर,
बाजार-ए-नफरत में नहीं घुले है।


-©ओमकार भास्कर 'दास'

Thursday, January 10, 2019

तू ही तू

तू दिल है मेरा,
तू मेरी जान है।
है आफताब मेरा तू,
तू ही मेरा ख्वाब है।
है तू खुदा मेरा,
तू ही है मेरा भगवान भी।
है भागवत का सार तू,
तू ही मेरी अजान भी।
तू नशा है,
तू जुनून है।
है तू मेरी बैचेनी,
तू ही मेरा सुकून है।
है तू खामोशी मेरी,
तू ही मेरे शब्द भी।
कभी-कभी तेरी बातें सुन,
हो जाता हूँ निशब्द भी।
है नाकामी मे खुश रहने का जरिया भी,
मेरे जिंदगी जीने का नजरिया भी।
तू ही मेरी जीत भी,
तू ही मेरी हार भी।
है तू मेरा गुरुर,
तू ही मेरा प्यार भी।
तू भूख है, तू प्यास है।
तूने कराया मुझको जिम्मेदारियों का एहसास है।
तेरी गोद में मेरा बचपन खेला है,
था मै शैतान बहुत, तूने कैसे मुझको झेला है।
मुझमें जो कुछ भी मेरा है,
वो सब कुछ तो तेरा है।
तू खुदा का मुझको उपहार है,
तेरे चेहरे की खुशी ही मेरा त्योहार है।
सुनो जरा कहता क्या लल्ला तेरा,
मां, तुझ पर जां भी निसार है।



-©ओमकार भास्कर 'दास'

Tuesday, January 8, 2019

बेटी कह रही मां से

बेटी कह रही मां से
न दे जन्म मुझे तू माँ,
मार दे अपनी सुन्दर कोख में
जन्नत बक्स दे मुझे तू माँ,
नहीं आना हैवानो की दुनिया में
बहुत इज्ज़त से हूँ यहाँ मैं माँ
सोती भी सुकून से हूँ
मुस्कुराती भी यहाँ मैं माँ,
वो दुनियां बड़ी नापाक है
तेरी नजरों से देखा है मैंने माँ
इज्ज़त से खेलते है वहाँ औरत की
और गलत भी उन्हें ही कहते है माँ,
कपड़ो का दोष बताते है
फिर बच्चियों का रेप यहाँ क्यों हो जाता है माँ
खुद की नजरों को ना सुधारते
और हमें गिरा हुआ क्यो बताते है ये माँ,
पत्थर की देवी की पूजा करते
फिर हमें इतना क्यों सताते है ये माँ
बाबा कितने अच्छे हैं
उनकी तरह सब क्यों नहीं है माँ ,
कब बंद होगी ये हैवानियत
तू कुछ बताती क्यों नहीं है माँ
आ जाऊ मैं बाहर
या यहीं सुकून से सो जाऊ मैं माँ ।।


-©चाँदनी पाठक 

Monday, January 7, 2019

मैं दिवानी

गहराईया ढू़ढ़ने निकली थी मुहब्बत की
पता ही न चला कब डूब गयी
गैरो को सम्भालने चली थी
और खुद ही मैं टूट गयी,
इश्क़ -ए-समंदर नापने की चाह की
आंसूओ की बारिश में भीग गयी
चली आंधी कुछ ऐसी
पत्तों की तरह बिखरी और टूट गयी,
खुद को बचाती भी कब तक
तेरी याद हर बार मुझे लूट गयी 
तुझसे मुहब्बत ही कुछ ऐसी हुई
मैं दिवानी खुद को ही भूल गयी ।।


-©चाँदनी पाठक 

Sunday, January 6, 2019

रात की तन्हाई

जब रात की तन्हाई
फिर लौट आएगी,
तूझे मेरी याद
बहुत रूलाएगी ।
तेरी हर मुस्कुराहट
आँसू में तब्दील हो जाएगी,
मेरी मासूमियत जब
तूझे याद आएगी।
तेरे धोखे पे तूझे
बहुत शर्म आएगी,
मेरे भरोसे की हद
जब तूझे समझ आएगी ।
तू तड़पेगा मेरी वापसी को,
जब मेरी खुशबू इन
फिजाओं में फैल जाएगी ।।



-©chandani pathak

Sunday, December 23, 2018

शख्स...

ये उस शख्स की कहानी है, जिसकी बातें रूहानी है।
बातें जो लबों से बेजुबानी हैं,आंखों से सब वो बतानी हैं।

जो कहती है जिंदगी के सफर में बस साथ तेरा चाहिए,
घर-बार,रिश्ते-नाते सब छूट जाएं,हाथों में हाथ तेरा चाहिए।
जिसमें भींगू मैं हाथ थाम कर तेरा, बरसात ऐसी चाहिए,
मिल कर हो न फिर कभी जुदा, एक रात ऐसी चाहिए।

वो पगली मुझे अपने ख्वाबों में बसा लेती है,
हर रात सपनों में आके मेरे, उन्हें हसीन बना देती है।
और रूठ कर जिस पल बात न करे मुझसे,
उस पल अपनी यादों से मुझे गमगीन बना देती है।

हां ये वहीं शख्स हैं, जो अपनी दुआओं में मुझे आमीन बना लेती है।

समझता हूं मैं भी कि
सारे बंधन जग से तोड़ कर हुई प्रेम में मेरे वो दीवानी है।
मैं भी हूं बावरा प्रेम में उसके, वो भी कुछ मस्तानी है।

ये उस शख्स की कहानी है, जिसकी बातें रूहानी हैं।

यूं तो ,
मैं तन उसका ,वो छाया मेरी।
मैं रूह उसका, वो काया मेरी।
वो सांस बनीं मेरे अन्दर है,
मैं बूंद, वो प्रीति समंदर है।

फिर भी मालूम है मुझे,
न हूं मैं कान्हा उसका।
पर हां, हां वो मेरी राधारानी है।

ये उस शख्स की कहानी है जिसकी बातें रूहानी हैं।।



-Collab (तरूणा चौरसिया, ओमकार भास्कर)

Sunday, December 9, 2018

कुछ कहती ये खामोशी

यारों,
इक लड़की है,
जो हर रात मेरी बेरूखी बातें सुन ख़ामोश हो जाती है।
टूट जाती है खुद अंदर ही अंदर,
पर फिर भी मुझ पर प्यार दिखाती है।

आज भी हुआ कुछ ऐसा ही,
न चाहते हुए भी कुछ बातें में बोल गया वैसा ही।
वो फिर हुइ ख़ामोश बस ,
जैसा हुआ कोई अफसोस बस।

परन्तु इस बार ये खामोशी कुछ और थी,
मेरे कानों में ये आज कर रही शोर थी।
जैसे ये मुझसे कह रही हों,

कोई रूठ गया आज।
धागा पतंग से बस टूट गया आज।
दिल जो दुखाया तूने उसका
पी गई वो आंसुओं के घूंट आज।

पर वो पगली कल फिर उठेगी सिर्फ तेरे ही ख्यालों संग,
दिल में भर कर प्यार की नई उमंग,
रहेगी फिर तेरे ही साये में नयी उम्मीद के संग।

हो सके तो तू बस इतना कर देना,
दिल से हटा कर शक की सिलवटें, उसे गले लगाना।
गर माफी न मांग सको अपनी गलती की,
तो कोई बात नहीं।
परन्तु फिर कभी उन आंखों में आंसू और चेहरे पे मुझे न आने देगा,
इतनी सी बात उसे कहना।

और खुश तो हो ही जाएगी , फिर तेरे नजदीक आते ही।
लेकिन सुन, यूं जो तू हर बार शक करता रहा,
तो एक दिन तुझे ही रूला देगी इस जहां से जाते ही।

तब तू रोयेगा , चीखेगा , चिल्लायेगा उस लाश के पास,
पर सब व्यर्थ है, तब उसको न होगा कुछ एहसास।

सुनकर उसकी खामोशी से कुछ ये बात,
मुझे और सताने लगी ये रात।
बस हर वक्त याद आती रहीं मुझे ,
आंसुओं से भींगी उसकी वो आंख।

कसम मुझे उन आंखों की,
उन आंखों से पोंछ आंसू मासूमियत मैं फिर लाउंगा।
ये सुबह कब होगी , मैं अपनी जांना से मिलने जाउंगा।
लगा सीने से कह दूंगा उसे , तूझे फिर कभी न सताउंगा।

देगी मुझे  जो  भी  सज़ा , कर  लूंगा वो मंजूर।
ला आंखों में आंसू उसकी, किया है मैंने कसूर।

#random_thought
#edited


- Omkar Bhaskar 

Friday, November 16, 2018

हालात...

तुम्हें मैं भूल जाऊं कैसे...
इतनी जो यादें हैं मेरी तुम्हारे साथ...
उन्हें दिल से मिटाऊं कैसे....
वो मेरी बाहों में आ जब तू रोई थी...
तेरा माथा चूम तब तुझको मैंने समझाया था...
तेरे साथ न होते हुए भी तेरे साथ रहूंगा मैं
ये बात मैंने तुझको बतलाया था...
चल अब तू ही बता इस बात को मैं झूठलाऊं कैसे...
और जो तुम कहती हो "यार मैं बेवफा हूं"
चलो मान तो लूं तुम्हें बेवफा मैं...
पर उससे पहले अपनी वफ़ा साबित करूं कैसे...
सुनो मैं जानता हूं, न तू गलत है न मैं हूं गलत...
पर हैं जो ये हालात गलत...
ऐसे हालात में अगर तुझे अकेला छोड़ दूं... तो मैं खुद से नजरें मिलाऊ कैसे...
हुआ जो रिश्ता छोटी सी दोस्ती से शुरू..
उसे यूं ही तोड़ दूं तो तेरा पक्का दोस्त कहलाऊं कैसे...
इस हालात के फेर में खुद को बेवफा कहने से पहले सुनो,
जिंदगी के हालातों से मैं कभी डरा नहीं...
इतनी जल्दी में हार मान लूं...
ऐसे कभी मैं लड़ा नहीं
बस मुझ पर थोड़ा भरोसा रखो...
अभी मैं मरा नहीं...

- Omkar Bhaskar

Wednesday, October 31, 2018

तन्हा मुसाफ़िर...

उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
हूं एक तन्हा मुसाफ़िर मैं, आज भी सिर्फ उसके ख्वाबों का सफर करता हूं...
छोड़ गया जो बीच राह में मुझे वो हमसफ़र मेरा...
उसके झूठे जज़्बातों की आज भी कदर करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
दिल से तो निकाल दिया है उस पत्थर दिल को...
पर ज़ेहन में आज भी उसी का ख्याल है...
शायद इसीलिए अपनी हर नज़्म में उसी का जिक्र करता हूं...
यूं तो चांदनी रात में रकीब का साथ बहुत अज़ीज़ है उसे...
पर यकीन मानिए मैं आज भी इस भ्रम में हूं ,
कि सिर्फ मैं ही उसकी फिक्र करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
वैसे तो उसने निभाई नहीं कभी वफ़ा अपनी...
पर कोशिश जो करता हूं लिखने की उसे बेवफा...
न जाने क्यों ऐसा लगता है मैं ग़लत करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
हूं एक तन्हा मुसाफ़िर मैं, आज भी सिर्फ उसके ख्वाबों का सफर करता हूं... 





- OMKAR BHASKAR

Tuesday, October 16, 2018

चले आओ...

चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
तुम्हारी बातों से होता था कभी खुशनुमा एहसास जो...
आज उस एहसास को तरसते हैं...
वैसे तो ख्वाबों में भी तुम्हारी ही यादें , तुम्हारी ही बातें है...
पर फिर भी खुली आंखों से याद आते हैं जो संग बिताए पल...
उनकी आरज़ू में रातों की नींद भी बर्बाद करते हैं...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
तेरी नज़रों से हुई थी कभी दिल में कशिश जो...
बस उन्हीं नज़रों को एक नज़र देखने को बैचेन रहते हैं...
हुई थी जो हमसे कुछ गुस्ताखियां..
शायद ये उन्हीं की सजा है कि आज तेरी याद में हम पल-पल मरते हैं ...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
वैसे तो मोहब्बत में तेरी हर सज़ा है हमें मंजूर...
पर यूं दूर जा कर न दो सज़ा हमें...
कि लौट आओ अब तुम, तुमसे गुस्ताख़ी माफ़ की अब फरियाद करते हैं...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...


- Omkar Bhaskar

Thursday, October 11, 2018

गुमनाम लड़की...

इक लड़की है गुमनाम सी...
दुनिया की बातों से अंजान सी...
रहती है अपने ही गम में वो परेशान सी...
किसी की यादों में खोई रहती...
किसी की बातें दिल में संजोए रहती...
ढूंढती किसी चेहरे में तस्वीर एक, भगवान सी...
इक लड़की है गुमनाम सी...
वो चेहरा जो था दिल उसका तोड़ गया...
मुड़ती राहों में साथ उसका छोड़ गया...
पर वो आज भी है खड़ी उसी जगह...
उसका दिल, उसकी मोहब्बत आज भी सिर्फ उस
चेहरे के लिए है पाक...
किसी क़ाज़ी के कुरान सी...
मस्जिद में होने वाली अजान सी...
उसकी यादों में वो रोज टूटती, रोज बिखरती ...
पर हर बार संभालती खुद को ...
बनाने निकली है अब वो अपनी पहचान सी...
इक लड़की है गुमनाम सी...
चाहता तो हूं लिखना इक मुकम्मल किताब उस पर...
ग़ालिब के दीवान सी....
पर बस , रहने दीजिए ,इतना समझ लिजिए ...
इक लड़की है गुमनाम सी...
रहती है अपने ही गम में वो परेशान सी...

- OMKAR BHASKAR

Sunday, October 7, 2018

कानपुर, यादों का शहर...

कानपुर, यादों का शहर...
खुद से किये कुछ अधूरे वादों का शहर...
लोगों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने के लिये.. देखे जो अनगिनत ख्वाब....
कानपुर, उन ख़्वाबों का शहर...
कानपुर,यादों का शहर...
रक्षाबंधन‌ में बहनों के हाथों ज्यादा मिठाई खाने के लिये..
हम सभी भाइयों में होने वाली छोटे-छोटे पर प्यारे विवाद..
कानपुर, उन विवादों का शहर...
किसी दूसरे शहर, जिसकी सबसे ज्यादा याद आती है...
वो मां और मां के खाने का स्वाद...
कानपुर, उन स्वादों का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...
स्कूल से लेकर कालेज तक...
जितने भी हुए यार-दोस्त अपने...
और उन सबके साथ मिलकर किये जितने भी कर्म-कांड...
कानपुर, उन कर्म-कांडो का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...
जिन गलियों में हुआ मुझे इश्क कभी...
जहां भीगा मैं अपनी माशूका संग बरसातों में...
कानपुर, उन बरसातों का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...

OMKAR BHASKAR