Wednesday, October 31, 2018

तन्हा मुसाफ़िर...

उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
हूं एक तन्हा मुसाफ़िर मैं, आज भी सिर्फ उसके ख्वाबों का सफर करता हूं...
छोड़ गया जो बीच राह में मुझे वो हमसफ़र मेरा...
उसके झूठे जज़्बातों की आज भी कदर करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
दिल से तो निकाल दिया है उस पत्थर दिल को...
पर ज़ेहन में आज भी उसी का ख्याल है...
शायद इसीलिए अपनी हर नज़्म में उसी का जिक्र करता हूं...
यूं तो चांदनी रात में रकीब का साथ बहुत अज़ीज़ है उसे...
पर यकीन मानिए मैं आज भी इस भ्रम में हूं ,
कि सिर्फ मैं ही उसकी फिक्र करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
वैसे तो उसने निभाई नहीं कभी वफ़ा अपनी...
पर कोशिश जो करता हूं लिखने की उसे बेवफा...
न जाने क्यों ऐसा लगता है मैं ग़लत करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
हूं एक तन्हा मुसाफ़िर मैं, आज भी सिर्फ उसके ख्वाबों का सफर करता हूं... 





- OMKAR BHASKAR

No comments:

Post a Comment