गहराईया ढू़ढ़ने निकली थी मुहब्बत की
पता ही न चला कब डूब गयी
गैरो को सम्भालने चली थी
और खुद ही मैं टूट गयी,
इश्क़ -ए-समंदर नापने की चाह की
आंसूओ की बारिश में भीग गयी
चली आंधी कुछ ऐसी
पत्तों की तरह बिखरी और टूट गयी,
खुद को बचाती भी कब तक
तेरी याद हर बार मुझे लूट गयी
तुझसे मुहब्बत ही कुछ ऐसी हुई
मैं दिवानी खुद को ही भूल गयी ।।
पता ही न चला कब डूब गयी
गैरो को सम्भालने चली थी
और खुद ही मैं टूट गयी,
इश्क़ -ए-समंदर नापने की चाह की
आंसूओ की बारिश में भीग गयी
चली आंधी कुछ ऐसी
पत्तों की तरह बिखरी और टूट गयी,
खुद को बचाती भी कब तक
तेरी याद हर बार मुझे लूट गयी
तुझसे मुहब्बत ही कुछ ऐसी हुई
मैं दिवानी खुद को ही भूल गयी ।।
-©चाँदनी पाठक
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