Saturday, January 26, 2019

ग़ज़ल

इक दर्द ने मेरा  साया-ए-दामन  थामा है,
मैंने भी उसको हमसफर अपना माना है।

रूबरू करा दे  इंसा को अपने ही  अक्स से,
गम-ए-तन्हाई ही तो इक ऐसा अफसाना है।

सीख लो  जीना दर्द -ओ- गम  के  साथ,
खुशी का  तो  बहुत  छोटा-सा  पैमाना है।

रूह भी  सोचती  होगी  इंतकाल  के बाद,
रोयेंगे  दो दिन,  फिर  सबने भूल  जाना है।

मोहब्बत  सिमट  चुकी  जिस्म की  भूख में,
कितना  वहशी  हो  चला  अब  जमाना है।

अच्छा  हुआ  जो रुखसत  हो चली  तू बेटी,
इक वहशी समाज का नही कोई ठिकाना है।


-©ओमकार भास्कर 'दास'

Thursday, January 10, 2019

तू ही तू

तू दिल है मेरा,
तू मेरी जान है।
है आफताब मेरा तू,
तू ही मेरा ख्वाब है।
है तू खुदा मेरा,
तू ही है मेरा भगवान भी।
है भागवत का सार तू,
तू ही मेरी अजान भी।
तू नशा है,
तू जुनून है।
है तू मेरी बैचेनी,
तू ही मेरा सुकून है।
है तू खामोशी मेरी,
तू ही मेरे शब्द भी।
कभी-कभी तेरी बातें सुन,
हो जाता हूँ निशब्द भी।
है नाकामी मे खुश रहने का जरिया भी,
मेरे जिंदगी जीने का नजरिया भी।
तू ही मेरी जीत भी,
तू ही मेरी हार भी।
है तू मेरा गुरुर,
तू ही मेरा प्यार भी।
तू भूख है, तू प्यास है।
तूने कराया मुझको जिम्मेदारियों का एहसास है।
तेरी गोद में मेरा बचपन खेला है,
था मै शैतान बहुत, तूने कैसे मुझको झेला है।
मुझमें जो कुछ भी मेरा है,
वो सब कुछ तो तेरा है।
तू खुदा का मुझको उपहार है,
तेरे चेहरे की खुशी ही मेरा त्योहार है।
सुनो जरा कहता क्या लल्ला तेरा,
मां, तुझ पर जां भी निसार है।



-©ओमकार भास्कर 'दास'

Tuesday, January 8, 2019

बेटी कह रही मां से

बेटी कह रही मां से
न दे जन्म मुझे तू माँ,
मार दे अपनी सुन्दर कोख में
जन्नत बक्स दे मुझे तू माँ,
नहीं आना हैवानो की दुनिया में
बहुत इज्ज़त से हूँ यहाँ मैं माँ
सोती भी सुकून से हूँ
मुस्कुराती भी यहाँ मैं माँ,
वो दुनियां बड़ी नापाक है
तेरी नजरों से देखा है मैंने माँ
इज्ज़त से खेलते है वहाँ औरत की
और गलत भी उन्हें ही कहते है माँ,
कपड़ो का दोष बताते है
फिर बच्चियों का रेप यहाँ क्यों हो जाता है माँ
खुद की नजरों को ना सुधारते
और हमें गिरा हुआ क्यो बताते है ये माँ,
पत्थर की देवी की पूजा करते
फिर हमें इतना क्यों सताते है ये माँ
बाबा कितने अच्छे हैं
उनकी तरह सब क्यों नहीं है माँ ,
कब बंद होगी ये हैवानियत
तू कुछ बताती क्यों नहीं है माँ
आ जाऊ मैं बाहर
या यहीं सुकून से सो जाऊ मैं माँ ।।


-©चाँदनी पाठक 

Monday, January 7, 2019

मैं दिवानी

गहराईया ढू़ढ़ने निकली थी मुहब्बत की
पता ही न चला कब डूब गयी
गैरो को सम्भालने चली थी
और खुद ही मैं टूट गयी,
इश्क़ -ए-समंदर नापने की चाह की
आंसूओ की बारिश में भीग गयी
चली आंधी कुछ ऐसी
पत्तों की तरह बिखरी और टूट गयी,
खुद को बचाती भी कब तक
तेरी याद हर बार मुझे लूट गयी 
तुझसे मुहब्बत ही कुछ ऐसी हुई
मैं दिवानी खुद को ही भूल गयी ।।


-©चाँदनी पाठक 

Sunday, January 6, 2019

रात की तन्हाई

जब रात की तन्हाई
फिर लौट आएगी,
तूझे मेरी याद
बहुत रूलाएगी ।
तेरी हर मुस्कुराहट
आँसू में तब्दील हो जाएगी,
मेरी मासूमियत जब
तूझे याद आएगी।
तेरे धोखे पे तूझे
बहुत शर्म आएगी,
मेरे भरोसे की हद
जब तूझे समझ आएगी ।
तू तड़पेगा मेरी वापसी को,
जब मेरी खुशबू इन
फिजाओं में फैल जाएगी ।।



-©chandani pathak

Sunday, December 23, 2018

शख्स...

ये उस शख्स की कहानी है, जिसकी बातें रूहानी है।
बातें जो लबों से बेजुबानी हैं,आंखों से सब वो बतानी हैं।

जो कहती है जिंदगी के सफर में बस साथ तेरा चाहिए,
घर-बार,रिश्ते-नाते सब छूट जाएं,हाथों में हाथ तेरा चाहिए।
जिसमें भींगू मैं हाथ थाम कर तेरा, बरसात ऐसी चाहिए,
मिल कर हो न फिर कभी जुदा, एक रात ऐसी चाहिए।

वो पगली मुझे अपने ख्वाबों में बसा लेती है,
हर रात सपनों में आके मेरे, उन्हें हसीन बना देती है।
और रूठ कर जिस पल बात न करे मुझसे,
उस पल अपनी यादों से मुझे गमगीन बना देती है।

हां ये वहीं शख्स हैं, जो अपनी दुआओं में मुझे आमीन बना लेती है।

समझता हूं मैं भी कि
सारे बंधन जग से तोड़ कर हुई प्रेम में मेरे वो दीवानी है।
मैं भी हूं बावरा प्रेम में उसके, वो भी कुछ मस्तानी है।

ये उस शख्स की कहानी है, जिसकी बातें रूहानी हैं।

यूं तो ,
मैं तन उसका ,वो छाया मेरी।
मैं रूह उसका, वो काया मेरी।
वो सांस बनीं मेरे अन्दर है,
मैं बूंद, वो प्रीति समंदर है।

फिर भी मालूम है मुझे,
न हूं मैं कान्हा उसका।
पर हां, हां वो मेरी राधारानी है।

ये उस शख्स की कहानी है जिसकी बातें रूहानी हैं।।



-Collab (तरूणा चौरसिया, ओमकार भास्कर)

Sunday, December 9, 2018

कुछ कहती ये खामोशी

यारों,
इक लड़की है,
जो हर रात मेरी बेरूखी बातें सुन ख़ामोश हो जाती है।
टूट जाती है खुद अंदर ही अंदर,
पर फिर भी मुझ पर प्यार दिखाती है।

आज भी हुआ कुछ ऐसा ही,
न चाहते हुए भी कुछ बातें में बोल गया वैसा ही।
वो फिर हुइ ख़ामोश बस ,
जैसा हुआ कोई अफसोस बस।

परन्तु इस बार ये खामोशी कुछ और थी,
मेरे कानों में ये आज कर रही शोर थी।
जैसे ये मुझसे कह रही हों,

कोई रूठ गया आज।
धागा पतंग से बस टूट गया आज।
दिल जो दुखाया तूने उसका
पी गई वो आंसुओं के घूंट आज।

पर वो पगली कल फिर उठेगी सिर्फ तेरे ही ख्यालों संग,
दिल में भर कर प्यार की नई उमंग,
रहेगी फिर तेरे ही साये में नयी उम्मीद के संग।

हो सके तो तू बस इतना कर देना,
दिल से हटा कर शक की सिलवटें, उसे गले लगाना।
गर माफी न मांग सको अपनी गलती की,
तो कोई बात नहीं।
परन्तु फिर कभी उन आंखों में आंसू और चेहरे पे मुझे न आने देगा,
इतनी सी बात उसे कहना।

और खुश तो हो ही जाएगी , फिर तेरे नजदीक आते ही।
लेकिन सुन, यूं जो तू हर बार शक करता रहा,
तो एक दिन तुझे ही रूला देगी इस जहां से जाते ही।

तब तू रोयेगा , चीखेगा , चिल्लायेगा उस लाश के पास,
पर सब व्यर्थ है, तब उसको न होगा कुछ एहसास।

सुनकर उसकी खामोशी से कुछ ये बात,
मुझे और सताने लगी ये रात।
बस हर वक्त याद आती रहीं मुझे ,
आंसुओं से भींगी उसकी वो आंख।

कसम मुझे उन आंखों की,
उन आंखों से पोंछ आंसू मासूमियत मैं फिर लाउंगा।
ये सुबह कब होगी , मैं अपनी जांना से मिलने जाउंगा।
लगा सीने से कह दूंगा उसे , तूझे फिर कभी न सताउंगा।

देगी मुझे  जो  भी  सज़ा , कर  लूंगा वो मंजूर।
ला आंखों में आंसू उसकी, किया है मैंने कसूर।

#random_thought
#edited


- Omkar Bhaskar