Wednesday, March 13, 2019

फासले कम क्यों नहीं होते...

यहां लोगों के दिलों से फासले कम क्यों नहीं होते,
अदालत-ए-इश्क़ में बेगुनाहों पर रहम क्यों नहीं होते।


मेरी हर इक दुआ पर जो आमीन कहते थे कभी,
अब उन लोगों की दुआओं में दम क्यों नहीं होते।


जो भी आता है इक नया जख्म देकर जाता है,
सोचता हूँ, ये जख्म ही मरहम क्यों नहीं होते।


गर पूरी दुनिया में है पनपा कीड़ा आतंकवाद का,
तो हिंदुस्तानियों के हाथों में ही बम क्यों नहीं होते।


शहीदों की लाश पर भी सियासत खेलने वालों,
तुम्हारे घर में भी आये-दिन मातम क्यों नहीं होते।


बाइबिल, क़ुरआन और गीता याद न रही किसी को, 
यीशू अल्लाह और कृष्ण के दोबारा जन्‍म क्यों नहीं होते।



-©ओमकार भास्कर 'दास'

Sunday, February 3, 2019

कितने प्यारे फूल खिले है....

कितने प्यारे फूल खिले है,
अंजाम अपना भूल, खिले हैं।

हैरान मेरी कामयाबी पर,
रकीबों के भी होठ सिले है।

अब न बिछड़ेगे हम कभी,
उलझनों से ये दिल मिले है।

नजरों में है हया- ए -मोहब्बत,
शायद यहाँ रुह से रुह मिले है।

अपनों ने दिया धोखा जब-जब,
कुछ पराये हमराही साथ चले है।

नहीं शौक कि कोई शायर कहे, 
हम तो मियाँ बस दिलजले है।

अल्लाह की इनायत है मुझ पर,
बाजार-ए-नफरत में नहीं घुले है।


-©ओमकार भास्कर 'दास'

Saturday, January 26, 2019

ग़ज़ल

इक दर्द ने मेरा  साया-ए-दामन  थामा है,
मैंने भी उसको हमसफर अपना माना है।

रूबरू करा दे  इंसा को अपने ही  अक्स से,
गम-ए-तन्हाई ही तो इक ऐसा अफसाना है।

सीख लो  जीना दर्द -ओ- गम  के  साथ,
खुशी का  तो  बहुत  छोटा-सा  पैमाना है।

रूह भी  सोचती  होगी  इंतकाल  के बाद,
रोयेंगे  दो दिन,  फिर  सबने भूल  जाना है।

मोहब्बत  सिमट  चुकी  जिस्म की  भूख में,
कितना  वहशी  हो  चला  अब  जमाना है।

अच्छा  हुआ  जो रुखसत  हो चली  तू बेटी,
इक वहशी समाज का नही कोई ठिकाना है।


-©ओमकार भास्कर 'दास'

Thursday, January 10, 2019

तू ही तू

तू दिल है मेरा,
तू मेरी जान है।
है आफताब मेरा तू,
तू ही मेरा ख्वाब है।
है तू खुदा मेरा,
तू ही है मेरा भगवान भी।
है भागवत का सार तू,
तू ही मेरी अजान भी।
तू नशा है,
तू जुनून है।
है तू मेरी बैचेनी,
तू ही मेरा सुकून है।
है तू खामोशी मेरी,
तू ही मेरे शब्द भी।
कभी-कभी तेरी बातें सुन,
हो जाता हूँ निशब्द भी।
है नाकामी मे खुश रहने का जरिया भी,
मेरे जिंदगी जीने का नजरिया भी।
तू ही मेरी जीत भी,
तू ही मेरी हार भी।
है तू मेरा गुरुर,
तू ही मेरा प्यार भी।
तू भूख है, तू प्यास है।
तूने कराया मुझको जिम्मेदारियों का एहसास है।
तेरी गोद में मेरा बचपन खेला है,
था मै शैतान बहुत, तूने कैसे मुझको झेला है।
मुझमें जो कुछ भी मेरा है,
वो सब कुछ तो तेरा है।
तू खुदा का मुझको उपहार है,
तेरे चेहरे की खुशी ही मेरा त्योहार है।
सुनो जरा कहता क्या लल्ला तेरा,
मां, तुझ पर जां भी निसार है।



-©ओमकार भास्कर 'दास'

Tuesday, January 8, 2019

बेटी कह रही मां से

बेटी कह रही मां से
न दे जन्म मुझे तू माँ,
मार दे अपनी सुन्दर कोख में
जन्नत बक्स दे मुझे तू माँ,
नहीं आना हैवानो की दुनिया में
बहुत इज्ज़त से हूँ यहाँ मैं माँ
सोती भी सुकून से हूँ
मुस्कुराती भी यहाँ मैं माँ,
वो दुनियां बड़ी नापाक है
तेरी नजरों से देखा है मैंने माँ
इज्ज़त से खेलते है वहाँ औरत की
और गलत भी उन्हें ही कहते है माँ,
कपड़ो का दोष बताते है
फिर बच्चियों का रेप यहाँ क्यों हो जाता है माँ
खुद की नजरों को ना सुधारते
और हमें गिरा हुआ क्यो बताते है ये माँ,
पत्थर की देवी की पूजा करते
फिर हमें इतना क्यों सताते है ये माँ
बाबा कितने अच्छे हैं
उनकी तरह सब क्यों नहीं है माँ ,
कब बंद होगी ये हैवानियत
तू कुछ बताती क्यों नहीं है माँ
आ जाऊ मैं बाहर
या यहीं सुकून से सो जाऊ मैं माँ ।।


-©चाँदनी पाठक 

Monday, January 7, 2019

मैं दिवानी

गहराईया ढू़ढ़ने निकली थी मुहब्बत की
पता ही न चला कब डूब गयी
गैरो को सम्भालने चली थी
और खुद ही मैं टूट गयी,
इश्क़ -ए-समंदर नापने की चाह की
आंसूओ की बारिश में भीग गयी
चली आंधी कुछ ऐसी
पत्तों की तरह बिखरी और टूट गयी,
खुद को बचाती भी कब तक
तेरी याद हर बार मुझे लूट गयी 
तुझसे मुहब्बत ही कुछ ऐसी हुई
मैं दिवानी खुद को ही भूल गयी ।।


-©चाँदनी पाठक 

Sunday, January 6, 2019

रात की तन्हाई

जब रात की तन्हाई
फिर लौट आएगी,
तूझे मेरी याद
बहुत रूलाएगी ।
तेरी हर मुस्कुराहट
आँसू में तब्दील हो जाएगी,
मेरी मासूमियत जब
तूझे याद आएगी।
तेरे धोखे पे तूझे
बहुत शर्म आएगी,
मेरे भरोसे की हद
जब तूझे समझ आएगी ।
तू तड़पेगा मेरी वापसी को,
जब मेरी खुशबू इन
फिजाओं में फैल जाएगी ।।



-©chandani pathak