हालात- ए -हिज्र में गुमनाम हुआ एक ख़्वाब है,
रूबरू हुआ तन्हाई से, जिंदगी में आया सैलाब है।
दर्द के साये में भी हरपल मुस्कुराता रहा वो,
जैसे कांटों की कैद में महकता कोई गुलाब है।
उभरना चाहता है सितम-ए-मोहब्बत से इस कदर,
डूबा हुआ महताब जैसे, फिर उगने को बेताब है।
रिहा जो हुआ किसी की यादों की गिरफ्त से,
तासीर जमाई है अब ऐसी, कहते सब नवाब है।
सिखलाता है जो हर्फ-दर-हर्फ नसीहतें अपनी, जिंदगी
रिश्तों में प्यार और सामंजस्य की एक किताब है।
- ओमकार भास्कर
No comments:
Post a Comment