Wednesday, October 31, 2018

तन्हा मुसाफ़िर...

उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
हूं एक तन्हा मुसाफ़िर मैं, आज भी सिर्फ उसके ख्वाबों का सफर करता हूं...
छोड़ गया जो बीच राह में मुझे वो हमसफ़र मेरा...
उसके झूठे जज़्बातों की आज भी कदर करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
दिल से तो निकाल दिया है उस पत्थर दिल को...
पर ज़ेहन में आज भी उसी का ख्याल है...
शायद इसीलिए अपनी हर नज़्म में उसी का जिक्र करता हूं...
यूं तो चांदनी रात में रकीब का साथ बहुत अज़ीज़ है उसे...
पर यकीन मानिए मैं आज भी इस भ्रम में हूं ,
कि सिर्फ मैं ही उसकी फिक्र करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
वैसे तो उसने निभाई नहीं कभी वफ़ा अपनी...
पर कोशिश जो करता हूं लिखने की उसे बेवफा...
न जाने क्यों ऐसा लगता है मैं ग़लत करता हूं...
उसकी यादों में आज भी बसर करता हूं...
हूं एक तन्हा मुसाफ़िर मैं, आज भी सिर्फ उसके ख्वाबों का सफर करता हूं... 





- OMKAR BHASKAR

Saturday, October 20, 2018

मिलें भी तो...

मिलें भी तो इस कदर...
साथ होकर भी साथ नहीं...
एक दुसरे का सुख दुख बांटने वाले हमसफ़र...
वक्त के खेल में उलझे इस कदर...
हाथों में हाथ होकर भी जिंदगी भर का साथ नहीं...
आंखों की तस्तरी से निकाल महफ़िल में परोसी जो यादें...
लोगों ने कहा कुछ तो बात है...
पर कोई ये न जाने,अब वो बात नहीं ...✍✍


- Omkar Bhaskar
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Tuesday, October 16, 2018

चले आओ...

चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
तुम्हारी बातों से होता था कभी खुशनुमा एहसास जो...
आज उस एहसास को तरसते हैं...
वैसे तो ख्वाबों में भी तुम्हारी ही यादें , तुम्हारी ही बातें है...
पर फिर भी खुली आंखों से याद आते हैं जो संग बिताए पल...
उनकी आरज़ू में रातों की नींद भी बर्बाद करते हैं...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
तेरी नज़रों से हुई थी कभी दिल में कशिश जो...
बस उन्हीं नज़रों को एक नज़र देखने को बैचेन रहते हैं...
हुई थी जो हमसे कुछ गुस्ताखियां..
शायद ये उन्हीं की सजा है कि आज तेरी याद में हम पल-पल मरते हैं ...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
वैसे तो मोहब्बत में तेरी हर सज़ा है हमें मंजूर...
पर यूं दूर जा कर न दो सज़ा हमें...
कि लौट आओ अब तुम, तुमसे गुस्ताख़ी माफ़ की अब फरियाद करते हैं...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...
कि चले आओ तुम्हें हम याद करते हैं...


- Omkar Bhaskar

Thursday, October 11, 2018

गुमनाम लड़की...

इक लड़की है गुमनाम सी...
दुनिया की बातों से अंजान सी...
रहती है अपने ही गम में वो परेशान सी...
किसी की यादों में खोई रहती...
किसी की बातें दिल में संजोए रहती...
ढूंढती किसी चेहरे में तस्वीर एक, भगवान सी...
इक लड़की है गुमनाम सी...
वो चेहरा जो था दिल उसका तोड़ गया...
मुड़ती राहों में साथ उसका छोड़ गया...
पर वो आज भी है खड़ी उसी जगह...
उसका दिल, उसकी मोहब्बत आज भी सिर्फ उस
चेहरे के लिए है पाक...
किसी क़ाज़ी के कुरान सी...
मस्जिद में होने वाली अजान सी...
उसकी यादों में वो रोज टूटती, रोज बिखरती ...
पर हर बार संभालती खुद को ...
बनाने निकली है अब वो अपनी पहचान सी...
इक लड़की है गुमनाम सी...
चाहता तो हूं लिखना इक मुकम्मल किताब उस पर...
ग़ालिब के दीवान सी....
पर बस , रहने दीजिए ,इतना समझ लिजिए ...
इक लड़की है गुमनाम सी...
रहती है अपने ही गम में वो परेशान सी...

- OMKAR BHASKAR

Sunday, October 7, 2018

कानपुर, यादों का शहर...

कानपुर, यादों का शहर...
खुद से किये कुछ अधूरे वादों का शहर...
लोगों की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने के लिये.. देखे जो अनगिनत ख्वाब....
कानपुर, उन ख़्वाबों का शहर...
कानपुर,यादों का शहर...
रक्षाबंधन‌ में बहनों के हाथों ज्यादा मिठाई खाने के लिये..
हम सभी भाइयों में होने वाली छोटे-छोटे पर प्यारे विवाद..
कानपुर, उन विवादों का शहर...
किसी दूसरे शहर, जिसकी सबसे ज्यादा याद आती है...
वो मां और मां के खाने का स्वाद...
कानपुर, उन स्वादों का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...
स्कूल से लेकर कालेज तक...
जितने भी हुए यार-दोस्त अपने...
और उन सबके साथ मिलकर किये जितने भी कर्म-कांड...
कानपुर, उन कर्म-कांडो का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...
जिन गलियों में हुआ मुझे इश्क कभी...
जहां भीगा मैं अपनी माशूका संग बरसातों में...
कानपुर, उन बरसातों का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...
कानपुर, यादों का शहर...

OMKAR BHASKAR