Tuesday, May 7, 2019

प्रीतम

प्रीतम 

मैं हूँ कोई बेल-री,
प्रीतम विटप समान।
जो लिपटूँ उनसे कभी,
तो अस्तित्व कमाऊँ।

मैं बरखा की बिन्दु-री,
प्रीतम सीप समान।
जो उनकी गोदी गिरूँ,
मैं मोती बन जाऊँ।

मैं हूँ प्यासी चातक-री,
प्रीतम स्वाति-नीर।
अधरों से स्पर्श करूँ,
तृष्णा सभी मिटाऊँ।

मैं हूँ ब्याहता नारी-री,
प्रीतम चन्दा-चौथ।
जो उनका दर्शन मिले,
करवा-चौथ मनाऊँ।

~©तरुणा चौरसिया

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