प्रीतम
मैं हूँ कोई बेल-री,
प्रीतम विटप समान।
जो लिपटूँ उनसे कभी,
तो अस्तित्व कमाऊँ।
मैं बरखा की बिन्दु-री,
प्रीतम सीप समान।
जो उनकी गोदी गिरूँ,
मैं मोती बन जाऊँ।
मैं हूँ प्यासी चातक-री,
प्रीतम स्वाति-नीर।
अधरों से स्पर्श करूँ,
तृष्णा सभी मिटाऊँ।
मैं हूँ ब्याहता नारी-री,
प्रीतम चन्दा-चौथ।
जो उनका दर्शन मिले,
करवा-चौथ मनाऊँ।
~©तरुणा चौरसिया
मैं हूँ कोई बेल-री,
प्रीतम विटप समान।
जो लिपटूँ उनसे कभी,
तो अस्तित्व कमाऊँ।
मैं बरखा की बिन्दु-री,
प्रीतम सीप समान।
जो उनकी गोदी गिरूँ,
मैं मोती बन जाऊँ।
मैं हूँ प्यासी चातक-री,
प्रीतम स्वाति-नीर।
अधरों से स्पर्श करूँ,
तृष्णा सभी मिटाऊँ।
मैं हूँ ब्याहता नारी-री,
प्रीतम चन्दा-चौथ।
जो उनका दर्शन मिले,
करवा-चौथ मनाऊँ।
~©तरुणा चौरसिया
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