Wednesday, May 15, 2019

भ्रूण हत्या

विधा : कहानी 
शीर्षक : भ्रूण हत्या 
दिनांक : 10/05/2019

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कहते हैं कि हम सबकी जिंदगी में कोई न कोई ऐसा शख्स जरुर होता है जिससे हम बिना थके घण्टों बातें कर सकते हैं। और बिना सोचे समझे दुनिया भर की ऊल-जुलूल बातें कर सकते हैं। और ज़्यादातर ये शख्स कोई और नहीं बल्कि हमारा बेस्ट फ्रेंड ही होता है। अब ईशा और मीत को ही ले लीजिए। दोनों सारा दिन व्हाट्‍सऐप पर उंगलियाँ चटकाते रहते थे। उफ्फ... कितनी बातें करते होंगे दोनों दिन भर में! और रात में भी सोते कहाँ थे ये दोनों? मीत जागकर पढ़ाई करता था और ईशा उसे जगाए रखती थी। फिर धीरे-धीरे यूँ हुआ कि पढ़ाई हुई एक तरफ़ और सारी-सारी रात ईशा और मीत चैटिंग करने लगे। ईशा को राइटिंग का शौक था और मीत को रीडिंग का। सो, कभी ईशा अपनी शायरियाँ और कविताएँ भेजकर उसे पढ़ाती तो कभी मीत किसी राइटर की शायरियाँ और ग़ज़लें ईशा को पढ़ाकर उसका हुनर तराशता। यूँ ही करते-करते कब सुबह के पाँच बज जाते, पता ही नहीं चलता था। और फिर पाँच बजे दोनों एक-दूसरे को 'गुड नाइट' बोलकर सो जाते। जी हाँ, ये होता था इनका गुड नाइट का समय। फिर डेढ़-दो घण्टे सोने के बाद जब ये उठते तो फिर से एक-दूसरे से चैटिंग में लग जाते। और इतनी बातें करते भी क्यों न दोनों? आख़िर नौ साल पुराने दोस्त जो थे। जब इनकी दोस्ती ने दसवें साल में कदम रखा तो नज़दीकियाँ और बढ़ गयीं। बातों और शायरियों ने और ज़ोर पकड़ लिया। इसी दौरान ईशा ने नोटिस किया मीत के बदलते शायराना अंदाज़ को। कभी-कभी तो उसे लगता मानों मीत की ज़िंदगी में किसी खास शख्स ने कदम रख दिया हो। मगर फिर सोचती 'न.. मीत उस टाइप का लड़का नहीं है। उसे कभी किसी से प्यार हो ही नहीं सकता।' मग़र मियाँ ये इश्क़ है। ये किसी को कब, कहाँ, किससे और कैसे हो जाए, कोई भरोसा थोड़े ही है। आखिर एक शाम मीत की एक शायरी पर ईशा ने पूछ ही लिया, "अबे गधे! क्या हुआ है तुझे? इश्क़ हो गया है क्या किसी से?" मीत ने आदतन टॉपिक चेंज कर दिया। फिर कुछ देर बाद फिर एक शायरी पर ईशा का दिमाग घूमा। और इस बार उसने डाइरेक्टली पूछा, "ओए बाबू मोशाय! कहीं तुझे मुझसे प्यार तो नहीं हो गया है?" मीत ने फिर से बात टालने की कोशिश की। मगर इस बार वो नाकाम रहा। ईशा को जवाब चाहिए था। बहुत पूछने पर मीत ने बस एक ही बात कही, "May be or may not be." ईशा असमंजस में पड़ गयी। बहुत सोचा, बहुत विचार किया। और फ़ाइनली एक ही नतीजा पाया-'नो, मीत ऐसा बिल्कुल नहीं है।' ख़ैर, दोनों अब भी अपनी दोस्ती को जी रहे थे। धीरे-धीरे गुज़रते वक़्त के साथ ईशा की ज़िंदगी में एक ऐसा शख्स आ गया, जो उसे बेइन्तेहाँ मोहब्बत करता था। ईशा ने भी उसके साथ ज़िन्दगी बिताने फैसला कर लिया। जब मीत को पता चला कि ईशा की ज़िंदगी में कोई नया शख्स आ गया है, तो उसे डर लगने लगा कि कहीं ईशा उससे दूर न हो जाए। तब उसे एहसास हुआ कि वाक़ई ईशा उसके लिए क्या है? आख़िर उसने वैलंटाइन वीक में ईशा को प्रपोज किया। मग़र... ईशा पहले ही किसी और का हाथ थाम चुकी थी। मीत दुःखी था इस बात से। उसने धीरे-धीरे ईशा से दूरी बनानी शुरू कर दी। ईशा समझ चुकी थी मीत का दर्द। और अब उसे शिकायत थी। शिकायत थी मीत से कि क्यों उसके पूछने पर भी मीत ने सच न कहा? क्यों उसने अपनी ही दोस्त से इतनी बड़ी बात छुपाई? और इससे भी बड़ी शिकायत थी उसे खुद से कि क्यों उसने खुद भी मीत को अपने नए रिश्ते के बारे में न बताया? क्यों उसने मीत की बातों को गहराई से नहीं सोचा? क्यों उसने उस 'May be or may not be' को ठीक से न समझा? क्यों उस 'May be' को उसने तवज्जो न दी? क्यों वो 'May not be' ही उसके दिमाग में घूमता रह गया? क्यों? आख़िर क्यों वो अपने बेस्ट फ्रेंड, अपने जिगरे की बातों को बिन बोले न समझ पायी?
डर गया था मीत अपनी सबसे प्यारी दोस्त को खोने से, तभी तो वक़्त रहते नहीं कह पाया अपने दिल की बात। अब बस अफसोस ही कर सकता है वो अपनी उस खामोशी पर।
उन दोनों ही दोस्तों की थोड़ी सी नादानी ने एक बेहद ही खूबसूरत रिश्ते को पैदा होने से पहले ही मार दिया था। वो दोनों ही कसूरवार थे उन हसरतों के, उन ख़्वाबों के और उस मासूम से रिश्ते के जिसकी उन्होंने की थी 'भ्रूण हत्या'। और अब इस भ्रूण हत्या की सज़ा उन दोनों को ही ताउम्र भुगतनी थी।

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~*©तरुणा चौरसिया*

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