Wednesday, March 13, 2019

फासले कम क्यों नहीं होते...

यहां लोगों के दिलों से फासले कम क्यों नहीं होते,
अदालत-ए-इश्क़ में बेगुनाहों पर रहम क्यों नहीं होते।


मेरी हर इक दुआ पर जो आमीन कहते थे कभी,
अब उन लोगों की दुआओं में दम क्यों नहीं होते।


जो भी आता है इक नया जख्म देकर जाता है,
सोचता हूँ, ये जख्म ही मरहम क्यों नहीं होते।


गर पूरी दुनिया में है पनपा कीड़ा आतंकवाद का,
तो हिंदुस्तानियों के हाथों में ही बम क्यों नहीं होते।


शहीदों की लाश पर भी सियासत खेलने वालों,
तुम्हारे घर में भी आये-दिन मातम क्यों नहीं होते।


बाइबिल, क़ुरआन और गीता याद न रही किसी को, 
यीशू अल्लाह और कृष्ण के दोबारा जन्‍म क्यों नहीं होते।



-©ओमकार भास्कर 'दास'

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