कितने प्यारे फूल खिले है,
अंजाम अपना भूल, खिले हैं।
अंजाम अपना भूल, खिले हैं।
हैरान मेरी कामयाबी पर,
रकीबों के भी होठ सिले है।
रकीबों के भी होठ सिले है।
अब न बिछड़ेगे हम कभी,
उलझनों से ये दिल मिले है।
उलझनों से ये दिल मिले है।
नजरों में है हया- ए -मोहब्बत,
शायद यहाँ रुह से रुह मिले है।
शायद यहाँ रुह से रुह मिले है।
अपनों ने दिया धोखा जब-जब,
कुछ पराये हमराही साथ चले है।
कुछ पराये हमराही साथ चले है।
नहीं शौक कि कोई शायर कहे,
हम तो मियाँ बस दिलजले है।
हम तो मियाँ बस दिलजले है।
अल्लाह की इनायत है मुझ पर,
बाजार-ए-नफरत में नहीं घुले है।
बाजार-ए-नफरत में नहीं घुले है।
-©ओमकार भास्कर 'दास'