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Saturday, January 26, 2019

ग़ज़ल

इक दर्द ने मेरा  साया-ए-दामन  थामा है,
मैंने भी उसको हमसफर अपना माना है।

रूबरू करा दे  इंसा को अपने ही  अक्स से,
गम-ए-तन्हाई ही तो इक ऐसा अफसाना है।

सीख लो  जीना दर्द -ओ- गम  के  साथ,
खुशी का  तो  बहुत  छोटा-सा  पैमाना है।

रूह भी  सोचती  होगी  इंतकाल  के बाद,
रोयेंगे  दो दिन,  फिर  सबने भूल  जाना है।

मोहब्बत  सिमट  चुकी  जिस्म की  भूख में,
कितना  वहशी  हो  चला  अब  जमाना है।

अच्छा  हुआ  जो रुखसत  हो चली  तू बेटी,
इक वहशी समाज का नही कोई ठिकाना है।


-©ओमकार भास्कर 'दास'

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